भोपाल। मध्यप्रदेश में शिशु मृत्यु दर (IMR) को लेकर चिंता बढ़ाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। भारत सरकार की ‘सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) सांख्यिकीय रिपोर्ट 2024’ के अनुसार, प्रदेश में हर 1000 जीवित जन्म लेने वाले बच्चों में से 35 बच्चे अपना पहला जन्मदिन नहीं देख पाते। इसी के साथ मध्यप्रदेश शिशु मृत्यु दर के मामले में देश में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, मध्यप्रदेश में नवजात मृत्यु दर (NMR) 26 दर्ज की गई है। यानी 35 में से 26 बच्चों की मौत जन्म के पहले 28 दिनों के भीतर ही हो जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि जन्म के शुरुआती दिन बच्चों के लिए सबसे संवेदनशील होते हैं और इसी अवधि में सबसे ज्यादा जोखिम बना रहता है।
पांच साल में सुधार, फिर भी राष्ट्रीय औसत से पीछे
प्रदेश में पिछले पांच वर्षों के दौरान शिशु मृत्यु दर में कुछ सुधार जरूर दर्ज हुआ है।
मध्यप्रदेश में IMR के आंकड़े
2019 : 46
2023 : 37
2024 : 35
यानी पांच वर्षों में 11 अंकों की गिरावट दर्ज हुई है। हालांकि इसके बावजूद मध्यप्रदेश राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे बना हुआ है।
राष्ट्रीय औसत
* 2019 : 30
* 2024 : 24
इस तरह मध्यप्रदेश का आंकड़ा राष्ट्रीय औसत से 11 अंक अधिक है।
ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा खतरा
रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण इलाकों में शिशु मृत्यु दर ज्यादा है।
ग्रामीण बनाम शहरी स्थिति
* ग्रामीण क्षेत्र : 37 मौत प्रति 1000 जन्म
* शहरी क्षेत्र : 28 मौत प्रति 1000 जन्म
विशेषज्ञों के अनुसार गांवों में कमजोर स्वास्थ्य सुविधाएं, समय पर इलाज न मिलना, अस्पतालों की दूरी और कुपोषण इसकी बड़ी वजह हैं।
जन्म के पहले 28 दिन सबसे ज्यादा संवेदनशील
मध्यप्रदेश में नवजात मृत्यु दर 26 होने का मतलब है कि बड़ी संख्या में बच्चों की मौत जन्म के पहले 28 दिनों में हो रही है।
इसके प्रमुख कारण बताए गए हैं—
* समय से पहले डिलीवरी
* कम वजन में जन्म
* संक्रमण
* नवजात ICU सुविधाओं की कमी
* गर्भावस्था के दौरान कमजोर स्वास्थ्य देखभाल
हर तीसरा बच्चा कुपोषण का शिकार
NFHS-5 (नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे) के अनुसार मध्यप्रदेश में कुपोषण भी गंभीर समस्या बना हुआ है।
कुपोषण से जुड़े आंकड़े
* 33% बच्चे कम वजन के
* 35.7% बच्चे उम्र के हिसाब से छोटे कद के
यानी प्रदेश में लगभग हर तीसरा बच्चा कुपोषण से प्रभावित है। आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में स्थिति और ज्यादा खराब बताई गई है।
केरल बना देश का सबसे बेहतर मॉडल
जहां मध्यप्रदेश अब भी संघर्ष कर रहा है, वहीं Kerala ने शिशु मृत्यु दर को काफी हद तक नियंत्रित कर लिया है।
केरल के आंकड़े
* 2021 : 6
* 2023 : 5
* 2024 : 8
यानी केरल में प्रति 1000 जन्म पर केवल 8 बच्चों की मौत दर्ज हुई, जो मध्यप्रदेश की तुलना में करीब चार गुना कम है।
विशेषज्ञों के अनुसार केरल ने जन्म के पहले 28 दिनों पर विशेष ध्यान दिया। वहां गर्भावस्था से लेकर प्रसव और नवजात देखभाल तक लगातार निगरानी की जाती है।
केरल की सफलता के प्रमुख कारण
* महिला शिक्षा का बेहतर स्तर
* समय पर टीकाकरण
* हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी की पहचान
* नवजात ICU सुविधाएं
* स्तनपान और पोषण पर फोकस
* मजबूत स्वास्थ्य ढांचा
अस्पतालों में प्रसव बढ़े, फिर भी चुनौती कायम
रिपोर्ट के मुताबिक मध्यप्रदेश में 91% से ज्यादा प्रसव अब अस्पतालों में हो रहे हैं। इसके बावजूद नवजातों और शिशुओं की मौत को रोकना स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
कैसे सुधर सकती है स्थिति
विशेषज्ञों का मानना है कि शिशु मृत्यु दर कम करने के लिए प्रदेश को कई स्तरों पर काम करना होगा।
जरूरी कदम
* ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करना
* हर जिले में विशेषज्ञ डॉक्टर और NICU सुविधा उपलब्ध कराना
* गर्भवती महिलाओं में एनीमिया रोकना
* हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी की समय पर पहचान
* रेफरल सिस्टम बेहतर बनाना
* नवजात निगरानी और पोषण कार्यक्रम मजबूत करना
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जन्म के पहले 28 दिनों में बच्चों को बेहतर चिकित्सा और पोषण मिल जाए तो शिशु मृत्यु दर में तेजी से कमी लाई जा सकती है।
