संपत्ति की भूख और बिखरते रिश्ते

SANDEEP SAHU
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कभी परिवार भारतीय समाज की सबसे बड़ी ताकत माना जाता था। रिश्तों की गर्माहट, आपसी विश्वास और त्याग की भावना परिवारों को एक सूत्र में बांधे रखती थी। लेकिन बदलते समय के साथ अब रिश्तों की नींव में दरारें साफ दिखाई देने लगी हैं। इन दरारों की सबसे बड़ी वजह बन रही है संपत्ति की अंधी भूख। जमीन, मकान और पैसों की चाहत अब रिश्तों पर इतनी भारी पड़ रही है कि अपने ही अपनों के दुश्मन बनते जा रहे हैं।

आज समाज में ऐसे अनेक मामले सामने आ रहे हैं, जहां भाई-भाई अदालतों में लड़ रहे हैं, बेटे माता-पिता को घर से निकाल रहे हैं, बहन-बेटियों को अधिकार से वंचित किया जा रहा है और पति-पत्नी के रिश्ते भी संपत्ति विवाद की भेंट चढ़ रहे हैं। कभी जो परिवार एक साथ बैठकर सुख-दुख बांटते थे, आज वही परिवार जायदाद के बंटवारे में टूटते नजर आ रहे हैं।

हाल के वर्षों में संपत्ति विवाद से जुड़ी घटनाओं में तेजी आई है। कहीं बुजुर्ग माता-पिता की हत्या कर दी जाती है, कहीं बहन को हिस्सा मांगने पर प्रताड़ित किया जाता है तो कहीं करोड़ों की जमीन के लिए भाई एक-दूसरे का खून बहाने तक पर उतर आते हैं। रिश्तों में बढ़ती यह कड़वाहट समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि आधुनिक जीवनशैली, बढ़ती भौतिकता और आर्थिक असुरक्षा ने लोगों की सोच को बदल दिया है। पहले परिवारों में संस्कार और सामूहिकता को महत्व दिया जाता था, लेकिन अब सफलता और संपत्ति को ही सम्मान का आधार माना जाने लगा है। यही कारण है कि लोग रिश्तों से ज्यादा धन को प्राथमिकता देने लगे हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन विवाद सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरे हैं। कई बार पिता की मृत्यु के बाद वारिसों के बीच बंटवारे को लेकर विवाद शुरू होता है और यह विवाद वर्षों तक अदालतों में चलता रहता है। दूसरी ओर शहरों में मकान और व्यवसायिक संपत्ति को लेकर परिवार टूट रहे हैं।

समाजशास्त्रियों का कहना है कि जब परिवारों में संवाद खत्म हो जाता है, तब विवाद गहराने लगते हैं। छोटी-छोटी गलतफहमियां समय के साथ इतनी बड़ी हो जाती हैं कि रिश्तों को संभालना मुश्किल हो जाता है। लालच और अहंकार इस आग में घी का काम करते हैं।

बुजुर्गों की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक होती जा रही है। जिन बच्चों को माता-पिता अपने जीवनभर की कमाई और मेहनत से बड़ा करते हैं, वही बच्चे कई बार संपत्ति अपने नाम कराने के बाद उन्हें अकेला छोड़ देते हैं। वृद्धाश्रमों में बढ़ती बुजुर्गों की संख्या इस बदलती सामाजिक मानसिकता की गवाही देती है।

महिलाओं को भी संपत्ति विवाद में अक्सर अन्याय का सामना करना पड़ता है। कानूनी अधिकार होने के बावजूद कई परिवार बेटियों को पैतृक संपत्ति में हिस्सा देने से बचते हैं। यदि कोई महिला अपने अधिकार की मांग करती है तो उसे परिवार विरोधी तक कह दिया जाता है।

रिश्तों में बढ़ती दूरियों का असर बच्चों पर भी पड़ रहा है। परिवारों के टूटने से बच्चों के मानसिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। वे तनाव, असुरक्षा और भावनात्मक अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान केवल कानून से संभव नहीं है। इसके लिए परिवारों में संवाद, संस्कार और नैतिक मूल्यों को फिर से मजबूत करना होगा। बच्चों को बचपन से ही यह सिखाना होगा कि रिश्तों की कीमत किसी भी संपत्ति से कहीं अधिक होती है।

जरूरत इस बात की है कि समाज धन को जीवन का साधन माने, लक्ष्य नहीं। क्योंकि संपत्ति इंसान को सुविधा दे सकती है, लेकिन टूटे रिश्तों की भरपाई कभी नहीं कर सकती। जब परिवार बिखरते हैं तो केवल घर नहीं टूटते, बल्कि विश्वास, अपनापन और इंसानियत भी टूट जाती है।

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