तीन साल के प्रदर्शन के आधार पर तैयार होगी रिपोर्ट; योजनाओं की प्रगति, फैसलों के क्रियान्वयन और मंत्रियों की कार्यशैली का होगा आकलन
भोपाल। मध्य प्रदेश की डॉ. मोहन यादव सरकार में मंत्रियों के कामकाज की समीक्षा और विभागों में फेरबदल की संभावनाओं को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। मंत्रिमंडल विस्तार पर फिलहाल स्थिति स्पष्ट नहीं होने के बीच सरकार का फोकस मंत्रियों के विभागीय प्रदर्शन, योजनाओं की प्रगति और प्रशासनिक फैसलों के क्रियान्वयन पर बताया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, मुख्य सचिव के माध्यम से विभागवार रिपोर्ट तैयार कराई जा रही है, जिसके आधार पर मंत्रियों की जिम्मेदारियों में बदलाव पर विचार किया जा सकता है।
तीन साल के कामकाज का होगा आकलन
सरकार की प्रस्तावित समीक्षा में मंत्रियों के पिछले तीन वर्षों के कामकाज का आकलन किए जाने की बात सामने आई है। इसमें विभागीय योजनाओं की प्रगति, प्रशासनिक गतिविधियों, लंबित फैसलों और योजनाओं के क्रियान्वयन की स्थिति को प्रमुखता दी जा सकती है। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि संबंधित मंत्री ने अपने विभाग को कितनी प्राथमिकता दी और निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करने में उसकी भूमिका कैसी रही।
सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव विभागवार रिपोर्ट के आधार पर उन विभागों की समीक्षा कर सकते हैं, जहां अपेक्षित प्रगति नहीं हुई है। समीक्षा के बाद कुछ मंत्रियों के विभाग बदले जाने या उनकी जिम्मेदारियों में बदलाव की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, इस संबंध में सरकार की ओर से किसी अंतिम निर्णय की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
मंत्रिमंडल विस्तार पर फिलहाल संशय
मंत्रिमंडल में नए चेहरों को शामिल करने और अनुभवी विधायकों को अवसर देने की चर्चाओं के बीच फिलहाल विभागों के पुनर्वितरण की संभावना अधिक मानी जा रही है। राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक, मंत्रिमंडल के पुनर्गठन को लेकर केंद्रीय नेतृत्व की मंजूरी का इंतजार है। ऐसे में मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल की समयसीमा को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
प्रदेश भाजपा संगठन की ओर से बदलाव की अपेक्षाओं के बावजूद राजनीतिक और संगठनात्मक समीकरण इस प्रक्रिया में अहम भूमिका निभा सकते हैं। वर्तमान में मंत्री पद की उम्मीद लगाए बैठे कई विधायक भी भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए संगठन और सरकार के साथ तालमेल बनाए हुए हैं।
जिलों के प्रभार में भी हो सकता है बदलाव
मंत्रियों के विभागों के साथ उनके प्रभार वाले जिलों में भी बदलाव की संभावना जताई जा रही है। बताया जा रहा है कि कुछ मंत्रियों को ऐसे जिलों का प्रभार दिया गया है, जहां पहुंचने में काफी समय लगता है। इससे नियमित दौरे और प्रशासनिक समीक्षा प्रभावित होने की आशंका रहती है।
ऐसे में सरकार विभागीय जिम्मेदारियों के साथ जिलों के प्रभार का भी पुनर्मूल्यांकन कर सकती है। उद्देश्य मंत्रियों की उपलब्धता बढ़ाने, स्थानीय प्रशासन के साथ बेहतर समन्वय स्थापित करने और विकास कार्यों की निगरानी को प्रभावी बनाना हो सकता है।
कामकाज और विवादों के आधार पर बढ़ सकती है जवाबदेही
मंत्रियों की कार्यशैली और विभागीय प्रदर्शन को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। कुछ विभागों में योजनाओं की गति, प्रशासनिक निर्णयों और खरीद प्रक्रियाओं को लेकर विवाद सामने आए हैं। ऐसे मामलों के बीच विभागवार समीक्षा को मंत्रियों की जवाबदेही तय करने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है।
राजनीतिक हलकों में नागर सिंह चौहान, लखन पटेल, विजय शाह, प्रतिमा बागरी और नरेंद्र शिवाजी पटेल से जुड़े विवादों की भी चर्चा होती रही है। हालांकि, इन मामलों की प्रकृति अलग-अलग है और किसी मंत्री के भविष्य को लेकर अंतिम निष्कर्ष आधिकारिक निर्णय के बाद ही निकाला जा सकेगा।
नागर सिंह चौहान से वन विभाग वापस लिए जाने के बाद उनके पास अनुसूचित जाति कल्याण विभाग की जिम्मेदारी है। वहीं, लखन पटेल से पशुपालन विभाग वापस लिए जाने को लेकर भी उनकी कार्यशैली और विभागीय प्रबंधन से जुड़े कारणों की चर्चा हुई थी। विजय शाह की कर्नल सोफिया कुरैशी से संबंधित टिप्पणी के मामले ने भी व्यापक राजनीतिक और कानूनी विवाद का रूप लिया था।
प्रतिमा बागरी के परिजनों से जुड़े कथित मादक पदार्थ तस्करी के मामलों और राज्य मंत्री नरेंद्र शिवाजी पटेल के बेटे पर मारपीट के आरोपों ने भी राजनीतिक चर्चा को हवा दी थी। इन मामलों में आरोपों और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका के बीच अंतर करना जरूरी है।
कई विभागों के कामकाज पर उठे सवाल
सरकार के सामने विभागीय जवाबदेही का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। आबकारी विभाग जहरीली शराब से जुड़ी घटनाओं और रिश्वत के आरोपों के कारण चर्चा में रहा है। स्वास्थ्य विभाग को कफ सिरप से जुड़े मामलों और बच्चों की मौत की घटनाओं को लेकर सवालों का सामना करना पड़ा है।
इसी तरह स्कूल शिक्षा विभाग में खरीद प्रक्रियाओं, शिक्षकों के तबादलों और स्कूलों के रखरखाव को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। नगरीय प्रशासन विभाग भी इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों तथा खरीद प्रक्रियाओं को लेकर चर्चा में रहा है।
इन घटनाओं के मद्देनजर विभागीय कामकाज की समीक्षा में योजनाओं की गुणवत्ता, प्रशासनिक निगरानी और जवाबदेही जैसे मुद्दे अहम हो सकते हैं।
रिपोर्ट के बाद तय होगी आगे की रणनीति
फिलहाल सरकार की प्राथमिकता विभागों के प्रदर्शन का आकलन और प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना मानी जा रही है। यदि समीक्षा में किसी विभाग का प्रदर्शन अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं पाया जाता है, तो संबंधित मंत्री की जिम्मेदारियों में बदलाव किया जा सकता है। हालांकि, मंत्रियों के विभाग बदलने, जिलों का प्रभार पुनर्वितरित करने या मंत्रिमंडल में फेरबदल को लेकर अंतिम फैसला मुख्यमंत्री और पार्टी नेतृत्व के स्तर पर ही होगा।
अब सबकी नजर विभागवार रिपोर्ट और उसके आधार पर लिए जाने वाले फैसलों पर है। यह समीक्षा केवल विभागीय पुनर्वितरण तक सीमित रहती है या मंत्रियों की राजनीतिक जिम्मेदारियों पर भी असर डालती है, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
