घने तारकीय समूहों में बार-बार होने वाले विलय से बन रहे हैं अत्यधिक द्रव्यमान वाले ब्लैक होल, वैज्ञानिकों को मिले महत्वपूर्ण प्रमाण
ब्रह्मांड के सबसे विशाल और रहस्यमय खगोलीय पिंडों में शामिल ब्लैक होल के निर्माण को लेकर वैज्ञानिकों को एक महत्वपूर्ण सफलता मिली है। एक नए अध्ययन में यह संकेत मिला है कि अत्यधिक द्रव्यमान वाले ब्लैक होल केवल विशाल तारों के ढहने से ही नहीं बनते, बल्कि घने तारकीय समूहों में छोटे ब्लैक होलों के बार-बार आपस में विलय होने से भी उनका निर्माण होता है।
वैज्ञानिकों ने इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए 153 ब्लैक होल विलयों का अध्ययन किया। यह जानकारी अत्यंत संवेदनशील गुरुत्वीय तरंग वेधशालाओं द्वारा दर्ज संकेतों के विश्लेषण से प्राप्त हुई। गुरुत्वीय तरंगें अंतरिक्ष और समय की संरचना में उत्पन्न होने वाली सूक्ष्म हलचलें होती हैं, जो तब पैदा होती हैं जब ब्रह्मांड में अत्यंत शक्तिशाली घटनाएं घटित होती हैं, जैसे दो ब्लैक होलों का टकराना या विलय होना।
वैज्ञानिकों के अनुसार, गुरुत्वीय तरंगों की अवधारणा सबसे पहले महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने वर्ष 1915 में अपने सामान्य सापेक्षता सिद्धांत के अंतर्गत प्रस्तुत की थी। एक शताब्दी बाद इन तरंगों का प्रत्यक्ष प्रमाण मिलने के बाद खगोल विज्ञान के अध्ययन में एक नई क्रांति आई है।
इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना था कि अत्यधिक द्रव्यमान वाले ब्लैक होल सीधे विशाल तारों के जीवन के अंत में बनते हैं या फिर वे घने तारकीय समूहों में छोटे ब्लैक होलों के बार-बार विलय का परिणाम हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि ब्लैक होलों की दो अलग-अलग श्रेणियां मौजूद हैं।
पहली श्रेणी अपेक्षाकृत कम द्रव्यमान वाले ब्लैक होलों की है, जिनका निर्माण संभवतः विशाल तारों के विस्फोट और उनके केंद्र के गुरुत्वीय पतन से हुआ है। दूसरी श्रेणी अत्यधिक द्रव्यमान वाले ब्लैक होलों की है, जिनमें तीव्र और अनियमित घूर्णन पाया गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे ब्लैक होल घने तारकीय समूहों में बार-बार हुए विलयों से बने हैं।
अध्ययन दल के प्रमुख वैज्ञानिक फैबियो एंटोनिनी ने कहा कि गुरुत्वीय तरंगों का अध्ययन अब केवल ब्लैक होलों की गिनती तक सीमित नहीं रह गया है। इसके माध्यम से यह समझने में सहायता मिल रही है कि ब्लैक होल कैसे विकसित होते हैं, किन परिस्थितियों में बनते हैं और विशाल तारों के जीवन तथा मृत्यु के बारे में क्या जानकारी प्रदान करते हैं।
शोध दल की सदस्य इसोबेल रोमेरो-शॉ ने बताया कि उच्च द्रव्यमान वाले ब्लैक होलों का एक अलग समूह के रूप में उभरकर सामने आना आश्चर्यजनक था। उन्होंने कहा कि कम द्रव्यमान वाले ब्लैक होलों की तुलना में इनका घूर्णन कहीं अधिक तेज और विभिन्न दिशाओं में पाया गया, जो बार-बार होने वाले विलयों की स्पष्ट पहचान है।
अध्ययन ने खगोल विज्ञान के एक लंबे समय से चले आ रहे रहस्य, जिसे "द्रव्यमान अंतराल" कहा जाता है, के प्रमाण भी प्रस्तुत किए हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि कुछ अत्यधिक विशाल तारे अपने जीवन के अंत में ब्लैक होल नहीं बनाते, बल्कि इतने शक्तिशाली विस्फोट के साथ नष्ट हो जाते हैं कि उनका कोई अवशेष नहीं बचता। इसके कारण एक ऐसी द्रव्यमान सीमा बन जाती है, जहां सामान्य परिस्थितियों में ब्लैक होल का निर्माण नहीं होना चाहिए।
शोधकर्ताओं के अनुसार यह सीमा सूर्य के द्रव्यमान के लगभग 45 गुना से प्रारंभ होती है। इससे अधिक द्रव्यमान वाले ब्लैक होलों का निर्माण संभवतः छोटे ब्लैक होलों के आपसी विलय से होता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अध्ययन न केवल ब्लैक होलों की उत्पत्ति को समझने में सहायक होगा, बल्कि विशाल तारों के अंतिम चरण, घने तारकीय समूहों की संरचना और ब्रह्मांड के विकास से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर भी प्रदान कर सकता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, वर्तमान में ज्ञात सबसे विशाल ब्लैक होल इस बात के संकेत दे रहे हैं कि ब्रह्मांड में होने वाली टक्करों और विलयों की भूमिका पहले की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। यह खोज भविष्य में खगोल विज्ञान के क्षेत्र में नए अनुसंधानों का मार्ग प्रशस्त कर सकती है और ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्यों को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
