क्या आम आदमी विकास से बाहर छूट रहा है?

SANDEEP SAHU
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संदीप साहू, पत्रकार    

भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा है। शहरों में ऊँची-ऊँची इमारतें खड़ी हो रही हैं, एक्सप्रेस-वे बन रहे हैं, डिजिटल क्रांति का विस्तार हो रहा है, मेट्रो रेलें दौड़ रही हैं और सरकारें विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही हैं। देश की जीडीपी बढऩे की खबरें लगातार सुर्खियाँ बनती हैं। अंतरिक्ष से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक भारत अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। लेकिन इन तमाम उपलब्धियों के बीच एक सवाल लगातार आम नागरिक के मन में उठता है कि क्या यह विकास वास्तव में उसके जीवन तक पहुँच रहा है? क्या देश का आम आदमी इस विकास यात्रा में शामिल है या वह धीरे-धीरे इससे बाहर छूटता जा रहा है? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि विकास का वास्तविक अर्थ केवल आर्थिक आंकड़ों की चमक नहीं होता, बल्कि वह आम लोगों के जीवन में आए बदलाव से तय होता है। यदि किसी देश की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही हो लेकिन वहाँ बेरोजगारी बढ़ रही हो, महंगाई आम लोगों की कमर तोड़ रही हो, किसानों की आय स्थिर हो, मजदूरों का जीवन संघर्षपूर्ण बना रहे और मध्यम वर्ग अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए लगातार कर्जे में डूबता जाए, तो ऐसे विकास पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आज भारत के गाँवों और छोटे शहरों में रहने वाला व्यक्ति यह महसूस करता है कि विकास की मुख्य धारा महानगरों तक सीमित होती जा रही है। बड़े शहरों में आधुनिक सुविधाएँ बढ़ रही हैं लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी दिखाई देती है। कई गाँवों में सडक़ें तो बन गईं, लेकिन अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं। स्कूल तो हैं लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं है। इंटरनेट पहुँच गया है लेकिन रोजगार के अवसर नहीं पहुँचे। ऐसे में विकास अधूरा और असंतुलित दिखाई देता है।

सबसे बड़ी चिंता रोजगार को लेकर है। आज देश का युवा सबसे अधिक परेशान दिखाई देता है। पढ़ाई पूरी करने के बाद भी लाखों युवाओं को नौकरी नहीं मिल रही। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों गुजार देने के बाद भी उन्हें सफलता नहीं मिलती। दूसरी तरफ निजी क्षेत्र में नौकरी की अस्थिरता बढ़ती जा रही है। कॉन्ट्रैक्ट आधारित रोजगार और कम वेतन ने युवाओं की आर्थिक सुरक्षा को कमजोर कर दिया है। तकनीकी विकास और ऑटोमेशन के कारण पारंपरिक रोजगार भी तेजी से समाप्त हो रहे हैं। ऐसे में आम आदमी यह सोचने पर मजबूर है कि यदि विकास के बावजूद रोजगार नहीं बढ़ रहा, तो आखिर यह विकास किसके लिए हो रहा है?

महंगाई भी आम नागरिक को विकास से दूर करने वाली सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है। खाद्य पदार्थों से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य और मकान तक हर चीज महंगी होती जा रही है। मध्यम वर्ग और गरीब वर्ग अपनी आय का बड़ा हिस्सा केवल बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में खर्च कर देता है। पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों का असर हर वस्तु पर पड़ता है। गैस सिलेंडर, बिजली बिल और दवाइयों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में विकास की चमक आम आदमी के लिए केवल टीवी और विज्ञापनों तक सीमित रह जाती है।

भारत का किसान भी इस विकास मॉडल में खुद को उपेक्षित महसूस करता है। देश की बड़ी आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है, लेकिन किसानों की आय और जीवन स्तर में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया। खेती की लागत लगातार बढ़ रही है जबकि फसलों का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। मौसम परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाएँ किसानों की मुश्किलें और बढ़ा रही हैं। कई किसान कर्ज  के बोझ तले दबे हुए हैं। शहरों में उद्योग और इंफ्रास्ट्रक्चर को प्राथमिकता मिलती है लेकिन खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को उतना महत्व नहीं दिया जाता। यही कारण है कि गाँवों से शहरों की ओर पलायन लगातार बढ़ रहा है। शहरी विकास की तस्वीर भी पूरी तरह सकारात्मक नहीं है। महानगरों में आधुनिक इमारतों और चमकदार बाजारों के पीछे झुग्गियों का विस्तार भी तेजी से हो रहा है। लाखों मजदूर और निम्न आय वर्ग के लोग असुरक्षित और अस्वस्थ वातावरण में रहने को मजबूर हैं। वे शहरों का निर्माण करते हैं लेकिन खुद सम्मानजनक जीवन से वंचित रहते हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान जब लाखों प्रवासी मजदूर पैदल अपने गाँव लौटने को मजबूर हुए, तब देश ने देखा कि विकास के दावों के पीछे कितना बड़ा सामाजिक असंतुलन मौजूद है।

डिजिटल इंडिया और तकनीकी विकास को आधुनिक भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि तकनीक ने लोगों का जीवन आसान बनाया है। ऑनलाइन सेवाएँ, डिजिटल भुगतान और इंटरनेट ने नई संभावनाएँ पैदा की हैं। लेकिन दूसरी ओर डिजिटल असमानता भी तेजी से बढ़ी है। ग्रामीण क्षेत्रों और गरीब परिवारों के पास अब भी बेहतर इंटरनेट और डिजिटल उपकरणों की कमी है। कई छात्र ऑनलाइन शिक्षा से इसलिए वंचित रह गए क्योंकि उनके पास स्मार्टफोन या इंटरनेट नहीं था। तकनीकी विकास तभी सार्थक माना जाएगा जब उसका लाभ समाज के हर वर्ग तक समान रूप से पहुँचे। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में भी विकास असमान दिखाई देता है। निजी स्कूल और अस्पताल तेजी से बढ़ रहे हैं लेकिन गरीब और मध्यम वर्ग के लिए गुणवत्तापूर्ण सुविधाएँ महंगी होती जा रही हैं। सरकारी संस्थानों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ धीरे-धीरे केवल आर्थिक रूप से मजबूत लोगों तक सीमित होती जा रही हैं। यदि किसी गरीब परिवार का सदस्य गंभीर बीमारी से पीडि़त हो जाए तो पूरा परिवार आर्थिक संकट में आ जाता है। यह स्थिति बताती है कि विकास की बुनियादी सुविधाएँ अब भी सभी के लिए समान नहीं हैं।

सामाजिक असमानता भी विकास के मॉडल पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है। देश में अमीर और गरीब के बीच की दूरी लगातार बढ़ रही है। कुछ लोगों के पास अपार संपत्ति है जबकि बड़ी आबादी अब भी न्यूनतम जरूरतों के लिए संघर्ष कर रही है। बड़े उद्योगपति और कॉरपोरेट क्षेत्र तेजी से आगे बढ़ रहे हैं लेकिन छोटे व्यापारी और कुटीर उद्योग कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। बाजारवाद और उपभोक्तावाद ने समाज में दिखावे और आर्थिक प्रतिस्पर्धा को बढ़ाया है, जिससे आम आदमी पर अतिरिक्त मानसिक और आर्थिक दबाव पड़ा है। विकास के नाम पर पर्यावरणीय संकट भी तेजी से बढ़ा है। जंगल कट रहे हैं, नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं और शहरों में प्रदूषण का स्तर खतरनाक होता जा रहा है। इसका सबसे अधिक असर गरीब और आम नागरिक पर पड़ता है। अमीर लोग तो सुरक्षित क्षेत्रों में रह सकते हैं लेकिन मजदूर और गरीब वर्ग प्रदूषण, जल संकट और खराब पर्यावरणीय परिस्थितियों का सीधा सामना करता है। जलवायु परिवर्तन के कारण किसानों और गरीब समुदायों की मुश्किलें और बढ़ रही हैं। यदि विकास प्रकृति और मानव जीवन दोनों को नुकसान पहुँचा रहा हो, तो उसकी दिशा पर पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है।

आज का आम आदमी केवल आर्थिक ही नहीं बल्कि मानसिक दबावों से भी जूझ रहा है। बढ़ती प्रतिस्पर्धा, असुरक्षा, नौकरी का संकट और सामाजिक अपेक्षाओं ने लोगों के जीवन में तनाव बढ़ा दिया है। विकास की दौड़ में व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक संतुलन पीछे छूटता जा रहा है। परिवारों में समय की कमी, सामाजिक रिश्तों में दूरी और अकेलेपन की भावना आधुनिक विकास की नई चुनौतियाँ बन चुकी हैं। राजनीतिक स्तर पर भी विकास अब एक बड़े प्रचार का माध्यम बन गया है। चुनावों में बड़ी परियोजनाओं, हाईवे, एयरपोर्ट और निवेश की घोषणाएँ प्रमुखता से दिखाई जाती हैं। लेकिन आम नागरिक चाहता है कि विकास का मतलब उसके बच्चों की अच्छी शिक्षा, सस्ती चिकित्सा, स्थायी रोजगार और सुरक्षित जीवन हो।

यदि विकास केवल आंकड़ों और प्रचार तक सीमित रह जाए तो वह लोगों के विश्वास को कमजोर करता है।

हालाँकि यह भी सच है कि भारत में कई सकारात्मक बदलाव हुए हैं। सडक़, बिजली, बैंकिंग और डिजिटल सेवाओं का विस्तार हुआ है। गरीबों के लिए अनेक योजनाएँ लागू की गई हैं। करोड़ों लोगों तक सरकारी सहायता पहुँची है। लेकिन चुनौती यह है कि विकास का लाभ समान रूप से समाज के हर वर्ग तक कैसे पहुँचे। केवल आर्थिक वृद्धि पर्याप्त नहीं है, बल्कि समावेशी विकास सबसे अधिक आवश्यक है।

समावेशी विकास का अर्थ है ऐसा विकास जिसमें गरीब, किसान, मजदूर, महिला, युवा और समाज का अंतिम व्यक्ति भी बराबर का भागीदार बने। विकास का उद्देश्य केवल शहरों को आधुनिक बनाना नहीं बल्कि गाँवों को मजबूत करना भी होना चाहिए। शिक्षा और स्वास्थ्य को बाजार की वस्तु नहीं बल्कि मौलिक अधिकार की तरह देखा जाना चाहिए। रोजगार आधारित विकास मॉडल को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि युवाओं को सम्मानजनक अवसर मिल सकें।

सरकारों के साथ-साथ समाज और निजी क्षेत्र की भी जिम्मेदारी है कि वे विकास को केवल लाभ और मुनाफे तक सीमित न रखें। कॉरपोरेट क्षेत्र को सामाजिक जिम्मेदारियों को गंभीरता से निभाना होगा। स्थानीय उद्योगों, छोटे व्यापारियों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किए बिना संतुलित विकास संभव नहीं है।

मीडिया की भूमिका भी यहाँ महत्वपूर्ण हो जाती है। मीडिया को केवल चमकदार विकास परियोजनाओं को दिखाने के बजाय आम लोगों की वास्तविक समस्याओं को भी सामने लाना चाहिए। जब तक नीति निर्माण में आम आदमी की आवाज़ शामिल नहीं होगी, तब तक विकास अधूरा रहेगा।

आज जरूरत इस बात की है कि विकास की परिभाषा को केवल आर्थिक उपलब्धियों से आगे बढ़ाकर मानवीय दृष्टिकोण से देखा जाए। किसी भी देश की वास्तविक प्रगति तभी मानी जाती है जब वहाँ का सामान्य नागरिक सुरक्षित, सम्मानजनक और संतुष्ट जीवन जी सके। यदि विकास के बावजूद आम आदमी खुद को असुरक्षित, बेरोजगार और उपेक्षित महसूस करे, तो यह संकेत है कि विकास की दिशा में सुधार की आवश्यकता है।

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह विकास और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन कैसे बनाए। यदि देश की प्रगति में आम आदमी की भागीदारी सुनिश्चित नहीं हुई तो आर्थिक असमानता और सामाजिक असंतोष बढ़ सकता है। लेकिन यदि विकास को समावेशी, संवेदनशील और मानव केंद्रित बनाया जाए, तो भारत वास्तव में एक मजबूत और न्यायपूर्ण राष्ट्र बन सकता है।

अंतत: यह कहना गलत नहीं होगा कि आज का आम आदमी विकास से पूरी तरह बाहर नहीं हुआ है, लेकिन वह विकास की मुख्य धारा में बराबरी का सहभागी भी नहीं बन पाया है। यही असमानता भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती है। विकास तभी सफल माना जाएगा जब उसकी रोशनी देश के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे और हर नागरिक यह महसूस करे कि यह देश और इसकी प्रगति वास्तव में उसकी भी है।


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