विकास के नाम पर पेड़ काटना क्या सही है?

SANDEEP SAHU
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-संदीप साहू 

आज दुनिया तेज़ी से विकास की दौड़ में आगे बढ़ रही है। नए शहर बस रहे हैं, चौड़ी सडक़ें बन रही हैं, मेट्रो परियोजनाएँ चल रही हैं, उद्योग स्थापित हो रहे हैं और बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी की जा रही हैं। इन सबके बीच सबसे अधिक नुकसान यदि किसी को हो रहा है, तो वह है प्रकृति और विशेष रूप से पेड़। विकास के नाम पर लाखों पेड़ काटे जा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या वास्तव में ऐसा विकास सही माना जा सकता है, जो इंसान की सुविधा के लिए प्रकृति का अस्तित्व ही खतरे में डाल दे? पेड़ केवल लकड़ी या हरियाली का स्रोत नहीं हैं, बल्कि वे पृथ्वी पर जीवन का आधार हैं। वे हमें ऑक्सीजन देते हैं, वातावरण को शुद्ध करते हैं, तापमान नियंत्रित रखते हैं और वर्षा चक्र को संतुलित बनाए रखते हैं। पेड़ मिट्टी के कटाव को रोकते हैं और जैव विविधता को सुरक्षित रखते हैं। यदि पेड़ नहीं होंगे तो मानव जीवन भी सुरक्षित नहीं रह सकता। इसके बावजूद विकास परियोजनाओं के लिए सबसे पहले जंगलों और पेड़ों को ही निशाना बनाया जाता है। सरकारें अक्सर यह तर्क देती हैं कि सडक़, रेलवे, एयरपोर्ट, उद्योग और आवासीय परियोजनाएँ देश की प्रगति के लिए जरूरी हैं। यह बात काफी हद तक सही भी है, क्योंकि विकास के बिना समाज आगे नहीं बढ़ सकता। लोगों को बेहतर परिवहन, रोजगार और आधुनिक सुविधाएँ चाहिए। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है। यदि हजारों पेड़ काटकर केवल कंक्रीट के जंगल खड़े किए जाएँ, तो यह विकास लंबे समय तक मानव समाज के लिए नुकसानदायक साबित होगा। आज भारत सहित पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की गंभीर समस्या से जूझ रही है। तापमान लगातार बढ़ रहा है, बारिश का चक्र बदल रहा है, सूखा और बाढ़ जैसी आपदाएँ बढ़ रही हैं। शहरों में गर्मी असहनीय होती जा रही है। इसका एक बड़ा कारण अंधाधुंध पेड़ों की कटाई है। पहले जहाँ पेड़ प्राकृतिक रूप से वातावरण को ठंडा रखते थे, वहीं अब उनकी जगह सीमेंट और डामर ने ले ली है, जो गर्मी को और बढ़ाते हैं। यही कारण है कि महानगर  ‘हीट आइलैंड’ में बदलते जा रहे हैं। विकास परियोजनाओं में अक्सर पर्यावरणीय प्रभावों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। कई बार हजारों पुराने पेड़ काट दिए जाते हैं और बदले में कुछ नए पौधे लगाने का वादा कर दिया जाता है।

लेकिन यह समझना जरूरी है कि सौ साल पुराने विशाल पेड़ की भरपाई कुछ छोटे पौधे तुरंत नहीं कर सकते। एक पेड़ को बड़ा होने में दशकों लग जाते हैं। इसलिए केवल पौधारोपण का दावा करके बड़े पैमाने पर कटाई को सही नहीं ठहराया जा सकता।

पेड़ों की कटाई का असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य पर भी सीधा प्रभाव डालता है। प्रदूषण बढऩे से सांस संबंधी बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं। शहरों में स्वच्छ हवा मिलना कठिन होता जा रहा है। बच्चों और बुजुर्गों पर इसका सबसे अधिक असर पड़ता है। यदि विकास के कारण लोगों का स्वास्थ्य ही खराब हो जाए, तो ऐसे विकास का क्या लाभ?

ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते, बल्कि लोगों की आजीविका और संस्कृति का हिस्सा होते हैं। जंगल कटने से वहाँ रहने वाले समुदायों का जीवन प्रभावित होता है। उनकी जमीन, जल स्रोत और प्राकृतिक संसाधन खत्म होने लगते हैं। कई बार विकास परियोजनाओं के नाम पर उन्हें विस्थापित भी होना पड़ता है। इसलिए विकास का प्रश्न केवल पर्यावरण नहीं बल्कि सामाजिक न्याय से भी जुड़ा हुआ है।

हालाँकि यह भी सच है कि हर विकास परियोजना को पूरी तरह रोक देना व्यावहारिक समाधान नहीं है। देश को सडक़ें, अस्पताल, स्कूल और उद्योग चाहिए। लेकिन विकास ऐसा होना चाहिए जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चले। दुनिया के कई देशों में  ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ यानी टिकाऊ विकास की अवधारणा पर काम हो रहा है। इसका अर्थ है ऐसा विकास जो वर्तमान जरूरतों को पूरा करे लेकिन भविष्य की पीढिय़ों के लिए पर्यावरण को नुकसान न पहुँचाए।

भारत में भी अब पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। कई जगह लोगों ने पेड़ों को बचाने के लिए आंदोलन किए हैं। अदालतों ने भी कई मामलों में पर्यावरण सुरक्षा को प्राथमिकता दी है। लेकिन केवल कानून और नीतियाँ पर्याप्त नहीं हैं। समाज को भी अपनी सोच बदलनी होगी। हमें यह समझना होगा कि पेड़ विकास के दुश्मन नहीं बल्कि सच्चे साथी हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि विकास योजनाओं में पेड़ों को बचाने के विकल्प तलाशे जाएँ। सडक़ें और भवन इस तरह डिजाइन किए जाएँ कि कम से कम पेड़ कटें। शहरों में बड़े स्तर पर हरित क्षेत्र विकसित किए जाएँ। उद्योगों को पर्यावरणीय जिम्मेदारी निभाने के लिए मजबूर किया जाए। केवल कागजों पर नहीं बल्कि वास्तविक रूप से पौधारोपण और संरक्षण को लागू किया जाए।

स्कूलों और समाज में पर्यावरण शिक्षा को मजबूत करना भी जरूरी है। जब तक नई पीढ़ी प्रकृति का महत्व नहीं समझेगी, तब तक केवल सरकारी प्रयासों से बदलाव संभव नहीं होगा। हर नागरिक को यह महसूस करना होगा कि एक पेड़ केवल प्रकृति की सुंदरता नहीं बल्कि आने वाली पीढिय़ों की सुरक्षा है।


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