दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जलाएं दीप; राजा हिमा के पुत्र की कथा से जुड़ी है यमदीप दान की प्राचीन परंपरा
भोपाल। धनतेरस का पर्व देशभर में भगवान धनवंतरी और मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना तथा सोना-चांदी और बर्तन खरीदने की परंपरा के लिए जाना जाता है। लेकिन इस दिन का धार्मिक महत्व केवल खरीदारी और समृद्धि की कामना तक सीमित नहीं है। धनतेरस की शाम को यमदीप दान का विशेष विधान भी है। मान्यता है कि इस दिन घर के मुख्य द्वार के बाहर भगवान यमराज के नाम से दीपक जलाने से परिवार पर अकाल मृत्यु का भय कम होता है और घर में सुख-शांति एवं दीर्घायु का आशीर्वाद बना रहता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यमदीप दान मृत्यु के देवता भगवान यमराज को समर्पित एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर से जुड़े गोस्वामी सेवक समिति के वरिष्ठ प्रतिनिधि पंडित श्रीनाथ गोस्वामी के अनुसार, धनतेरस की संध्या पर श्रद्धा और विधि-विधान से यमदीप दान करने की परंपरा है। इसे परिवार के सदस्यों की लंबी आयु और अकाल मृत्यु से रक्षा की कामना के साथ किया जाता है।
दक्षिण दिशा में जलाया जाता है चार बत्तियों वाला दीपक
यमदीप दान में दिशा का विशेष महत्व माना गया है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, दीपक का मुख दक्षिण दिशा की ओर रखा जाता है, क्योंकि दक्षिण दिशा को भगवान यमराज की दिशा माना जाता है। सामान्य मिट्टी के दीपक की जगह इस अनुष्ठान में गेहूं के आटे से बना दीपक या मिट्टी का चौमुखी दीपक इस्तेमाल किया जाता है। इसमें चार बत्तियां लगाकर सरसों या तिल का तेल भरा जाता है।
दीपक जलाने से पहले घर के मुख्य द्वार के बाहर की जगह को साफ किया जाता है। इसके बाद वहां जल, फूल और अक्षत अर्पित कर दीपक प्रज्वलित किया जाता है। इस दौरान भगवान यमराज से परिवार के सभी सदस्यों की सुरक्षा, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्रार्थना की जाती है। मान्यता है कि इस परंपरा के पालन से घर में नकारात्मकता दूर होती है और परिवार पर ईश्वर की कृपा बनी रहती है।
राजा हिमा के पुत्र की कथा से जुड़ी है परंपरा
यमदीप दान की परंपरा के पीछे राजा हिमा के पुत्र की एक प्रचलित पौराणिक कथा भी है। कथा के अनुसार, राजा हिमा के पुत्र की कुंडली में भविष्यवाणी की गई थी कि विवाह के चौथे दिन सर्पदंश से उसकी मृत्यु हो जाएगी। यह जानने के बाद राजकुमार की पत्नी ने पति की जान बचाने का संकल्प लिया।
विवाह के चौथे दिन उसने पति को सोने नहीं दिया और पूरी रात जागकर भजन-कीर्तन करती रही। उसने घर के मुख्य द्वार पर सोने-चांदी के आभूषणों का ढेर लगा दिया और चारों ओर तेल के दीपक जलाकर पूरे स्थान को रोशन कर दिया।
मान्यता के अनुसार, निर्धारित समय पर भगवान यमराज सर्प का रूप धारण कर राजकुमार के प्राण लेने पहुंचे। लेकिन आभूषणों से निकलने वाली चमक और दीपकों के तेज प्रकाश के कारण वे भीतर प्रवेश नहीं कर सके। पूरी रात राजकुमार की पत्नी के भजन सुनने के बाद यमराज सुबह वहां से लौट गए। इस तरह राजकुमार की जान बच गई।
दीपदान के साथ जुड़ा है दीर्घायु का संदेश
पौराणिक कथा के आधार पर धनतेरस पर दीपदान की यह परंपरा प्रचलित हुई। मान्यता है कि यमदीप जलाने से भगवान यमराज प्रसन्न होते हैं और परिवार को अकाल मृत्यु के भय से सुरक्षा प्रदान करते हैं। यही वजह है कि धनतेरस की शाम को मुख्य द्वार के बाहर दीपक जलाने की परंपरा आज भी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।
धनतेरस पर जहां भगवान धनवंतरी से आरोग्य और मां लक्ष्मी से सुख-समृद्धि की कामना की जाती है, वहीं यमदीप दान के माध्यम से परिवार की लंबी आयु और मंगलमय जीवन की प्रार्थना की जाती है।
