देवास। खातेगांव के टीआई दिलीप पुरी की जान लेने वाला ट्रक महज एक सड़क हादसे का हिस्सा नहीं था, बल्कि पुलिस जांच में उसके जरिए शराब तस्करी के बड़े नेटवर्क का खुलासा हुआ है। ट्रक में अवैध रूप से गुजरात ले जाई जा रही शराब की करीब 1,400 पेटियां लदी थीं। जांच में सामने आया है कि इस कारोबार का नेटवर्क हरदा जिले के टिमरनी से शुरू होकर गुजरात तक फैला था। पुलिस के मुताबिक, लाइसेंसी शराब दुकानों से स्टॉक उठाकर उसे कथित तौर पर अवैध तरीके से गुजरात पहुंचाया जाता था। इस पूरे कारोबार में हर ट्रक से 8 से 10 लाख रुपए तक की कमाई का अनुमान है।
जांच में टिमरनी की तीन शराब दुकानों और चार साझेदारों की भूमिका सामने आई है। तस्करी के लिए तीन स्तर की सुरक्षा व्यवस्था बनाई गई थी, ताकि रास्ते में पुलिस की कार्रवाई से बचा जा सके। टीआई की मौत के बाद सामने आए इस नेटवर्क ने आबकारी विभाग और पुलिस की निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
चार साझेदारों के बीच बंटती थी तस्करी की कमाई
पुलिस जांच के अनुसार, इस नेटवर्क का मुख्य संचालन राहुल जायसवाल करता था। शराब दुकानों से स्टॉक उठाने, सप्लाई का रास्ता तय करने और तस्करी से मिलने वाली रकम का हिसाब रखने की जिम्मेदारी उसी के पास थी।
टिमरनी में सोडलपुर रोड, हरदा रोड और रहटगांव स्थित तीन शराब दुकानों के लाइसेंस पाटेन्द्र जायसवाल के नाम पर थे। हालांकि, इनका संचालन चार साझेदार मिलकर कर रहे थे।
तस्करी से मिलने वाली रकम पहले राहुल जायसवाल के पास जमा होती थी। इसके बाद तय हिस्सेदारी के अनुसार वितरण किया जाता था। राहुल, मनीष और मोहिन जायसवाल को 30-30 प्रतिशत हिस्सा मिलता था, जबकि लाइसेंसधारक पाटेन्द्र जायसवाल को 10 प्रतिशत रकम दी जाती थी।
1,400 पेटियों की खेप लेकर गुजरात जा रहा था ट्रक
खातेगांव में जिस ट्रक की चपेट में आने से टीआई दिलीप पुरी की मौत हुई, उसमें करीब 1,400 पेटियां शराब लदी हुई थीं। पुलिस जांच में इस खेप का संबंध टिमरनी की सोडलपुर रोड स्थित शराब दुकान से सामने आया है।
इस शराब को देवास के रास्ते करीब 700 किलोमीटर का सफर तय कर गुजरात पहुंचाया जाना था। शराब कारोबार से जुड़े लोगों के मुताबिक, गुजरात में शराब की मांग और वहां के अवैध बाजार में मिलने वाली ऊंची कीमत के कारण एक ट्रक की खेप से 8 से 10 लाख रुपए तक का मुनाफा हो सकता था।
तीन स्तर की सुरक्षा के बीच होती थी तस्करी
जांच में सामने आया है कि इस नेटवर्क में शराब की खेप को सुरक्षित गंतव्य तक पहुंचाने के लिए तीन स्तर की सुरक्षा व्यवस्था बनाई गई थी। रास्ते में पुलिस की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए मुखबिरों का नेटवर्क भी सक्रिय रहता था।
आबकारी नियमों के तहत प्रत्येक लाइसेंसी दुकान के स्टॉक, बिक्री और परिवहन की सीमा निर्धारित होती है। इसके बावजूद पुलिस को आशंका है कि दुकानों से वैध रूप से खरीदा गया स्टॉक फर्जी दस्तावेजों अथवा बिना जरूरी परमिट के निर्धारित क्षेत्र से बाहर भेजा जाता था।
पुलिस की जांच में ट्रकों की पहचान छिपाने और दूसरे सामान के परिवहन की आड़ लेकर शराब की खेप ले जाने जैसे तरीके भी सामने आए हैं। हालांकि, इस सुरक्षा तंत्र में शामिल सभी लोगों की भूमिका की जांच अभी जारी है।
19 महीने पहले भी पकड़ी गई थी टिमरनी की शराब
टिमरनी की शराब दुकानों से तस्करी का मामला पहली बार सामने नहीं आया है। करीब 19 महीने पहले, 1 मार्च को टिमरनी पुलिस ने इंदौर-बैतूल नेशनल हाईवे पर सुदामा होटल के पास एक ट्रक पकड़ा था।
ट्रक से गोवा व्हिस्की की 4,332 बोतलें यानी 361 पेटियां बरामद हुई थीं। जब्त शराब की कीमत 23.60 लाख रुपए बताई गई थी। उस मामले के तार भी टिमरनी से जुड़े मिले थे।
अब खातेगांव की घटना के बाद जब्त शराब पर मिले बैच नंबर 025 ने एक बार फिर टिमरनी की दुकान को जांच के केंद्र में ला दिया है। पुलिस पुराने मामले और मौजूदा तस्करी नेटवर्क के बीच संबंधों की भी पड़ताल कर रही है।
आबकारी और पुलिस की निगरानी व्यवस्था पर उठे सवाल
इस पूरे मामले ने सरकारी निगरानी तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आबकारी विभाग की भूमिका: दुकानों के वास्तविक स्टॉक और बिक्री का नियमित मिलान नहीं होने, असामान्य खरीद-बिक्री पर निगरानी की कमी और परिवहन परमिट के सत्यापन में लापरवाही की आशंका सामने आई है।
पुलिस की निगरानी: हाईवे पर संदिग्ध वाहनों की जांच और निगरानी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। मामले ने यह स्पष्ट किया है कि कार्रवाई केवल ट्रक और उसके चालक तक सीमित रखने के बजाय तस्करी के पीछे सक्रिय पूरे नेटवर्क तक पहुंचना जरूरी है।
13 आरोपी हिरासत में, तीन दुकानें सील
मामले में कार्रवाई करते हुए पुलिस ने टिमरनी की तीनों शराब दुकानों के लाइसेंस निलंबित कर उन्हें सील कर दिया है। अब तक 13 आरोपियों को हिरासत में लिया गया है।
डीजीपी उपेंद्र जैन के मुताबिक, पुलिस ने शराब तस्करी नेटवर्क की पहचान कर ली है। शराब कहां से लाई गई, कहां भेजी जा रही थी और इसमें कौन-कौन शामिल था, इसकी जानकारी जुटाई जा चुकी है। नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका की जांच जारी है।
वहीं, मामले में लापरवाही सामने आने के बाद हरदा के सहायक जिला आबकारी अधिकारी अमरसिंह बघेल और आरक्षक अरुण कुम्बरे तथा कृष्णपाल सिंह डोडिया को निलंबित किया गया है।
टीआई के परिवार को एक करोड़ की आर्थिक सहायता
टीआई दिलीप पुरी की मौत के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने उनके परिवार के लिए आर्थिक सहायता की घोषणा की है। मुख्यमंत्री ने उनकी पत्नी को अनुकंपा नियुक्ति के तहत सब इंस्पेक्टर (SI) का पद देने और परिवार को एक करोड़ रुपए की आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की घोषणा की है।
टीआई की मौत ने जहां पुलिस महकमे को झकझोर दिया है, वहीं इस घटना की जांच में सामने आए शराब तस्करी के नेटवर्क ने एक बड़े अवैध कारोबार की परतें खोल दी हैं। अब जांच का मुख्य फोकस इस नेटवर्क के बाकी सदस्यों, आर्थिक लेन-देन और तस्करी में मदद करने वाले लोगों तक पहुंचने पर है।
